छत्तीसगढ़: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जातिगत आरक्षण के खिलाफ लड़ने वालों का बढ़ा हौसला… छत्तीसगढ़ में लोगों की उम्मीद बढ़ीं…

रायपुर। मराठा आरक्षण (महाराष्ट्र) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से छत्तीसगढ़ में जातिगत आरक्षण बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे लोगों की उम्मीद बढ़ गई है। विधि विशेषज्ञों की राय में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का व्यापक असर होगा। राज्य के वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष विरेंद्र पांडेय की ने कहा कि माराठा आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि 50 फीसद से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता।

साथ ही कोर्ट ने किसी को एससी, एसटी या पिछड़ा मानने का आधार भी पूछा है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का छत्तीसगढ़ में जातिगत आरक्षण के केस पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि यहां भी आरक्षण की सीमा 50 फीसद से अधिक हो गई है।

छत्तीसगढ़ में सितंबर 2019 में राज्य सरकार ने जातिगत आरक्षण को लेकर अध्यादेश जारी किया था। इसमें अनुसूचित जनजाति (एसटी) को मिलने वाले 32 फीसद आरक्षण में को यथावत रखते हुए अनुसूचित जाति (एससी) का आरक्षण 12 से बढ़ाकर 13 और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का14 से बढ़ाकर सीधे 27 फीसद कर दिया था। इसके साथ ही आर्थिक आधार पर 10 फीसद और आरक्षण देने का फैसला किया था।

इस तरह राज्य में आरक्षण का दायरा 82 फीसद तक पहुंच चुका है, जबकि आरक्षण 50 फीसद से अधिक नहीं हो सकता। राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ करीब आधा दर्जन जनहित याचिकाएं हाई कोर्ट में लगी हुई हैं। कोर्ट ने मामले में फैसला आने तक ओबीसी के आरक्षण में की गई बढ़ोतरी पर रोक लगा रखी है।

2012 में ही 50 फीसद का दायरा हाे चुका है पार

प्रदेश में इससे पहले पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही जातिगत आरक्षण 50 फीसद की सीमा पार कर चुका था। 2012 में तत्कालीन सरकार ने जातिगत आरक्षण में बदलाव किया था, जिससे कुल् आरक्षण 58 फीसद पहुंच गया था। सरकार के उस फैसले को भी कोर्ट में चुनौती दी गई है।

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