बिलासपुर प्रेस क्लब; पहले प्रभार बदला, फिर आदेश निरस्त हुआ… अब संस्था के नाम पर चंदा..? पढ़िए चंदा पत्र…

प्रेस क्लब बिलासपुर के इतिहास में संस्था के आधिकारिक लेटरहेड पर इस तरह “सहयोग राशि ₹_____” का बाकायदा कॉलम देकर सरकारी विभागों, नेताओं और निजी संस्थाओं से राशि मांगने की ऐसी परंपरा सामने नहीं आती।

प्रेस क्लब बिलासपुर के प्रतिष्ठित सदस्य को अब एक के बाद एक सामने आ रही घटनाओं को देखने की जरूरत है। सबसे पहले संविधान के ठेकेदारों की अनदेखी करते हुए सचिव और पद के पद पर नियुक्ति का निर्णय लिया गया। केस सहायक पंजीयक तक पहुंच और सहायक पंजीयक ने उस प्रावधान परिवर्तन के आदेश को रद्द कर दिया। यानी जिस निर्णय को निर्णय ने अपना अधिकार ले लिया, वह जांच और सिद्धांतों के बाद टिक नहीं सका।


यह मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस से प्राप्त राशि बैंक खाते में जमा नहीं हुआ और अधिकार से बाहर के खर्चे जाने के बारे में जांच की प्रक्रिया जारी है।

और अब सामने आया है स्मारिका के नाम पर सहयोगी राइस कंपनी का नया मामला।

कार्यक्रम और स्मारक का प्रकाशन पहले भी हो रहे हैं। सहयोग भी मिल रहा है। लेकिन तब आपके व्यक्तिगत संपर्क और बिक्री के आधार पर सहयोग थे। प्रेस क्लब बिलासपुर के इतिहास में संस्था के आधिकारिक लेटरहेड पर इस तरह की “सहयोग राशि ₹ _____” का बा उल्लेखित पद सरकारी हिस्सेदारी, नेताओं और निजी व्यक्तित्व से राशिश क्वान की ऐसी परंपरा सामने नहीं आती।

तो सवाल बहुत सीधा है—

जब संविधान में इस प्रकार चंदा/सहयोगी राशी स्माइक का कोई प्रावधान नहीं है, तो यह अधिकार दिया गया है?

आमसभा से क्या छूट ली गयी?

किस संविधान में कोई धारा दिखाई दे सकती है?

राशि बैंक किस बैंक में जाएगा?

हर राशि की रसीद क्या होगी?

और क्या एक-एक रुपये का खाता सदस्य के सामने रखा जाएगा?

यदि सभी कुछ नियम अस्पष्ट हैं तो दस्तावेज़ सामने रखें डर किस बात का?

और समूह को यह भी सूचीबद्ध करना होगा कि छात्र सहायता राशि का नहीं, संस्था का नाम, लेटरहेड और अधिकार का उपयोग किया जाता है।

आज सचिव और पदाधिकरी संविधान के विपरीत बदल जाते हैं और बाद में वह पद पर आसीन होने का आदेश देते हैं। आज संस्था के आर्थिक मामलों पर सवाल उठ रहे हैं। और अब संस्था के लेटरहेड से आर्थिक सहयोग मांगा जा रहा है।

क्या यह संयोग है या धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीर संस्था को संविधान से नहीं, इस्लाम की ओर से संस्था बनाने की कोशिश की जा रही है?

अब पार्ट को अलग रहने की जरूरत नहीं, डोनड फ्रेंड की जरूरत है।

प्रेस क्लब किसी अध्यक्ष या कर्मचारी की निजी जागीर नहीं है। यह संस्था की संस्था है। यहां पर संविधान के अधीन हैं, संविधान के अधीन नहीं हैं।

इसलिए प्रश्न प्रश्न और तब तक प्रश्न जब तक उत्तर न मिले—

 व्यवस्थापन का अधिकार कहाँ से मिला?

विभाग का परिवर्तन आदेश क्यों हुआ?

प्रेस कांफ्रेंस की राशि का पूरा खाता कहाँ है?

स्मारिका के नाम पर सहायता राशि मित्र का

अधिकारसंवैधानिक दिया गया?

और प्रेस क्लब के लैटरहेड पर राइस प्रिंसेस की दौलत किस प्रस्ताव से मिली?

अब सदस्य तय करता है—प्रेस क्लब संविधान से समझौता करें या कुछ निबंधों की सुविधा और मनमर्जी से।