झीरम घाटी हत्याकांड: आपराधिक प्रकरण हस्तांतरित करने का नहीं है अधिकार… जानिए एनआईए कोर्ट ने क्या कहा…

बिलासपुर। झीरम हत्याकांड में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआइए के बाद पुलिस द्बारा षड़यंत्र व हत्या का अपराध दर्ज करने के मामले को चुनौती देने वाली याचिका पर अंतिम सुनवाई के दौरान गुरुवार को भी बहस जारी रही। एनआईए की बहस पूरी होने के बाद हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया। उन्होंने कहा कि आपराधिक प्रकरण को हस्तांतरित करने का अधिकार एनआईए कोर्ट को नहीं है। सामान्य अपराधों की जांच का अधिकार राज्य पुलिस को होता है। इस मामले में शुक्रवार को भी बहस जारी रहेगी। इस प्रकरण की सुनवाई अब निर्णायक दौर में है। जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव व जस्टिस विमला सिह कपूर की युगलपीठ में बुधवार से इस प्रकरण में अंतिम सुनवाई चल रही है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के एडिशनल सालिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी व हाई कोर्ट के असिस्टेंट सालिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा ने तर्क रखे। उन्होंने एनआइए कोर्ट के अधिकारों के संबंध में तर्क दिया। साथ ही बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 व एनआइए एक्ट की धारा 11 से 16 मे वर्णित एनआइए कोर्ट के अधिकार नए आपराधिक प्रकरण स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त है। उनकी बहस पूरी होने के बाद हस्तक्षेपकर्ता व पुलिस में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने वाले जितेंद्र मुदलियार की तरफ से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव व संदीप दुबे ने बहस की। जितेंद्र के पिता स्व. उदय मुदलियार झीरम घाटी में शहीद हुए थे। अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि सामान्य रूप से अपराधों की जांच का अधिकार राज्य पुलिस को होता है। लेकिन एनआइए एक्ट इसका अपवाद है।

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